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वमन, वमिटिंग और बोमी

 संस्कृत और उससे निष्पन्न तत्सम शब्द है ' वमन'। इसका अर्थ है पेट यानी अमाशय में भरे पदार्थ का मुख के रास्ते बाहर निकल आना। आम तौर पर जब किसी का पेट खराब होता है अथवा अपच हो जाता है और पेट में गयी सामग्री को शरीर स्वीकार नहीं करता तो वह मुखमार्ग से बाहर आ जाती है। यही वमन कहलाता है।  हवाई यात्रा अथवा बस या कार में कुछ यात्रियों का खाया- पिया सब मुंह से बाहर निकल आता है। इसे समेटकर रखने के‌ लिए हर सीट पर वमन थैली रखी जाती है।  बांग्ला, असमिया आदि में वमन को बोमी कहते हैं। अंग्रेजी में इसी को वमिट और वमिटिंग कहा जाता है। बहुत संभव है कि अंग्रेजी की तर्ज पर वमिटिंग से बोमी बना हो। यह भी संभव है कि संस्कृत वमन से ही बांग्ला और असमिया जैसी सहोदरा भाषाओं में यह शब्द गया हो। और वहीं से अंग्रेजी में।   

गूंधना और गूंथना

 गेहूँ, मक्का, ज्वार, बाजरा, जौ, चावल आदि अनाजों के चूर्ण यानी पिसान‌ को पानी या किसी अन्य द्रव से सानने की प्रक्रिया को गूंधना कहते हैं। अब पिसान यानी अन्न को पीसने के उपरान्त चूर्णीकृत वस्तु को पिसान कोई नहीं कहता। पूरा देश उसे आटा कहता है। कुछ लोग आंटा भी। दक्षिण में तेलुगु भाषी लोग उसे पिण्डि कहते थे। लेकिन अब आटा ही अधिक लोकप्रिय है। जबसे मिल का थैलीबंद पिसान बिकने लगा है, तबसे यह अंग्रेजी पर्याय अधिक लोकप्रिय हो चला है, क्योंकि थैलियों पर अंग्रेजी में आटा ही छपा दिखता है।  खैर... हमारा कथन यही है कि आधे को गूंधा जाता है। इसी प्रकार मिट्टी को भी ईंट, खिलौने, मूर्ति आदि बनाने के पूर्व गूंधा ही जाता है।  इसीसे मिलता- जुलता शब्द है गूंथना। सुई में धागा डालकर फूलों में गोद-गोदकर उनकी माला बनाने की प्रक्रिया ही फूल गूंथना कहलाती है। संभवतः यह पद ग्रथन से बना होगा। ग्रथन यानी धागे में पिरोना, बींधना या माला बनाना।  दो लोग लड़ाई में या प्रेम में जब एक- दूसरे के शरीर से चिपट जाते हैं तो कहा जाता है कि वे गुत्थमगुत्था हो रहे थे। यानी एक- दूजे से ग्रथित थे। पंजाब में सिर ...

धान, चावल, अन्नमु और भात

  धान, चावल, अन्नमु और भात डॉ. रामवृक्ष सिंह भारत ग्लोब के उस हिस्से का देश है, जहाँ वर्ष-पर्यन्त (दक्षिण में) अथवा वर्ष के चार-पाँच महीने (उत्तर में) इतनी गरमी और उमस रहती है कि उसमें धान की पर्याप्त खेती हो पाती है। धान हमारी संस्कृति के सबसे प्राचीन खाद्यान्नों में से एक है। सिन्धु घाटी सभ्यता के मृद्भाण्डों में चावल मिला है। इससे सिद्ध होता है कि उस समय चावल यहाँ के मूल निवासियों के भोजन का अभिन्न अंग हुआ करता है। हमारे धार्मिक अनुष्ठानों, जीवन से जुड़े विभिन्न संस्कारों आदि में चावल का प्रयोग कभी अक्षत के रूप में तो कभी दूल्हा-दुल्हन द्वारा अंजुरी भरने या खोंचा बाँधने के लिए किया जाता है। चावल की इतनी गहन सांस्कृतिक सम्पृक्ति यह सिद्ध करती है कि भारत की कृषि-बहुला जीवनधारा में इसका बहुत-ही महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। दक्षिण भारत की जलवायु धान उगाने के लिए वर्षपर्यन्त बहुत अनुकूल रहती है। इसलिए वहाँ धान की तीन-तीन फसलें भी ले ली जाती हैं। इसके विपरीत उत्तर में यह केवल खरीफ़ यानी बरसात के उमस भरे मौसम की फसल है। दक्षिण का प्रधान खाद्यान्न धान है। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि आन्...

नाथना, नांधना और नांद

  नाथना ,  नाँधना और नाँद डॉ. रामवृक्ष सिंह ,  लखनऊ मोबा- 7905952129. 8090752129   पहली बात तो यह है कि नाथना और नाँधना ,  दोनों पृथक शब्द हैं। ऐसा नहीं कि  ‘ नाँधना ’  शब्द  ‘ नाथना ’  के बदले भूलवश लिखा गया है। एक कहावत है न आगे नाथ न पीछे पगहा। अगर इसका यही रूप है तो तथ्यतः त्रुटिपूर्ण है। नाथ भी आगे ही होता है और पगहा भी आगे ही। बस नाथ का संबंध नथुने ,  नासिका या नाक से है ,  जबकि पगहा का संबंध पशु के गले में बंधी उस लंबी रस्सी से ,  जिसका दूसरा सिरे खुंटे या किसी स्थिर आलंब से बंधा रहता है। नाथ से पशु पूरी तरह नियंत्रण में आ जाता है ,  जबकि पगहे के ज़रिए वह एक ठीहे पर बँधा रहता है। नाथ और नथ- एक ही मूल शब्द के दो रूप हैं। महिलाओं का पारंपरिक गहना है नथ ,  नथुनी या नथिया। यह गोलाकार आभूषण नाक की बाहरी माँसल त्वचा को छेदकर पहना जाता है। कुछ विद्वान इसका भी एक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य बताते हैं। कई सदी पहले एक राज्य विशेष के आक्रान्ता जब किसी अन्य राज्य पर आक्रमण करके उसे जीत लेते थे तो अन्य धन-सम्पदा के साथ-साथ वहाँ क...
  दौड़, परिगेत्तुलु, रन, किल्ली, गिल्ली, गेंद और बल्ला                                                                  डॉ. रामवृक्ष सिंह, लखनऊ यह सभी शब्द एक ही खेल से संबंधित हैं, जिसे हम ‘ क्रिकेट ’ के नाम से जानते हैं। कभी हॉकी हमारे देश का राष्ट्रीय खेल हुआ करता था। किताबों और अभिलेखों में शायद अब भी हो। किन्तु हमारे बचपन में यानी साठ-सत्तर के दशक में हॉकी का जैसा चाव बच्चों और युवाओं में दिखता था, वैसा तो क्या, उसका दो प्रतिशत भी अब कहीं नहीं दिखता। गाँवों में उससे भी कहीं अधिक चाव कबड्डी का हुआ करता था। स्कूल जाते-आते बच्चे कहीं भी बस्ता पटक कर कबड्डी खेल लिया करते थे। उसके लिए किसी साजो-सामान की ज़रूरत न थी। बस डेढ़ बिस्वे का सपाट मैदान ही काफी हुआ करता था। और आबालवृद्ध किसी भी भारतीय को भारत माँ की मिट्टी में लोटपोट होने से कोई गुरेज़ न था। आज स्थिति बिलकुल बदल चुकी है। अब जो ...
  मलाई या मलय ? डॉ. रामवृक्ष सिंह, लखनऊ हिन्दी और इतर भारतीय भाषाओं के शब्दों को लिपिबद्ध करने की जैसी क्षमता भारतीय लिपियों में है, रोमन लिपि में वैसी सुविधा और क्षमता नहीं है। इसका ज्वलन्त उदाहरण है उपर्युक्त शब्द- मलाई। यह शब्द सेन्गोल (ब्रह्मदण्ड या राजदण्ड) के साथ आज निरन्तर चर्चा में है। तमिलनाडु से आये सेन्गोल (या सेंगोल) को भारत के नई दिल्ली-स्थित, नव-निर्मित संसद-भवन में स्थापित किया जाएगा। उससे पहले आज नई दिल्ली के आर.के. पुरम (रामकृष्ण पुरम) के सेक्टर-सात स्थित मलय मन्दिर में उसकी विधिवत पूजा-अर्चना की गई, या यों कहें कि संसद-भवन में, सभापति की आसंदी के बगल में स्थापित किए जाने का पूर्वाभ्यास किया गया। नई दिल्ली के दक्षिणी हिस्से में रहनेवाले नागरिक जानते हैं कि रामकृष्ण पुरम के सेक्टर -7 और सेक्टर -6 के मध्य एक नाला बहता है (या उन दिनों बहा करता था, जब हम वहाँ जाते-आते थे)। उस नाले के किनारे वसन्त विहार की ओर से हौज़ खास की ओर जानेवाली सड़क से लगभग सटकर एक ऊँचा भू-भाग है, जिसपर तमिल समाज का हिन्दू मन्दिर निर्मित है। उक्त नाले के साथ-साथ, सेक्टर-6 से सटे हिस्से में...

खोर, खोरी, खोरा, खुराक और खोराकी

  खोर ,  खोरी ,  खोरा ,  खुराक और खोराकी डॉ. रामवृक्ष सिंह ,  लखनऊ फ़ारसी में एक शब्द है ख़ूर  / ख़ोर ,  यानी खाने वाला। इसी से बना होगा ख़ुराक या ख़ोराकी। खोराकी या खुराकी ,  यानी वह राशि जो किसी को खाने के उद्देश्य से दी जाए। कालान्तर में खोराकी शब्द मज़दूरी के लिए रूढ़ हो गया और लोग कहने लगे कि अमुक-अमुक इतनी रुपये खोराकी उठाता है। यानी उसकी मासिक मज़दूरी इतने रुपये है। ख़ुराक से आशय है किसी व्यक्ति की भोजन-क्षमता। कोई कितना खा सकता है- इसे कहते हैं खुराक। खोर का एक अर्थ होता है खानेवाला। जैसे आदमखोर यानी आदमियों को खा जानेवाला। अहसानफ़रामोश या उपकार को न माननेवाले यानी कृतघ्न व्यक्ति के लिए बोले जानेवाले एक अपशब्द में भी खोर शब्द का प्रयोग होता है। किन्तु वह अपना वर्ण्यविषय नहीं है। हैदराबाद (तैलंगाना ,  भारत) में एक प्रसिद्ध संग्रहालय है- सालारजंग संग्रहालय। हम इस संग्रहालय को देखने अनेक बार जा चुके हैं। दुनिया में किसी व्यक्ति के निजी संग्रहालय में इतनी वस्तुएँ नहीं हैं ,  जितनी सालारजंग के संग्रहालय में हैं। सालारजंग इस शहर के निज...