गूंधना और गूंथना
गेहूँ, मक्का, ज्वार, बाजरा, जौ, चावल आदि अनाजों के चूर्ण यानी पिसान को पानी या किसी अन्य द्रव से सानने की प्रक्रिया को गूंधना कहते हैं। अब पिसान यानी अन्न को पीसने के उपरान्त चूर्णीकृत वस्तु को पिसान कोई नहीं कहता। पूरा देश उसे आटा कहता है। कुछ लोग आंटा भी। दक्षिण में तेलुगु भाषी लोग उसे पिण्डि कहते थे। लेकिन अब आटा ही अधिक लोकप्रिय है। जबसे मिल का थैलीबंद पिसान बिकने लगा है, तबसे यह अंग्रेजी पर्याय अधिक लोकप्रिय हो चला है, क्योंकि थैलियों पर अंग्रेजी में आटा ही छपा दिखता है।
खैर... हमारा कथन यही है कि आधे को गूंधा जाता है। इसी प्रकार मिट्टी को भी ईंट, खिलौने, मूर्ति आदि बनाने के पूर्व गूंधा ही जाता है।
इसीसे मिलता- जुलता शब्द है गूंथना। सुई में धागा डालकर फूलों में गोद-गोदकर उनकी माला बनाने की प्रक्रिया ही फूल गूंथना कहलाती है। संभवतः यह पद ग्रथन से बना होगा। ग्रथन यानी धागे में पिरोना, बींधना या माला बनाना।
दो लोग लड़ाई में या प्रेम में जब एक- दूसरे के शरीर से चिपट जाते हैं तो कहा जाता है कि वे गुत्थमगुत्था हो रहे थे। यानी एक- दूजे से ग्रथित थे। पंजाब में सिर के बालों की चोटी को गुत्त कहते हैं, तो शायद उसका कारण भी चोटी का ग्रथन ही हो। गुत्त=गुत्थ=ग्रथन।
आजकल भाषा के बारे में लोग न सोचते हैं न पढ़ते हैं। यही कारण है कि कोई व्यक्ति एक वर्तनी गलत लिख देता है तो सब लोग बिना सोचे- समझे वैसा ही लिखने लगते हैं। हमारे बचपन में गूंधना शब्द सानने के लिए खूब चलता था। आटा गूंधना=आटा साधना।
किन्तु अब लोग फूल गूंथना, वेणी में फूल गूंथना और रसोई में आटा गूंथना बोलते हैं। गूंधना शब्द अब केवल कोश में रह गया है।
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